Wednesday, 17 October 2018

#MeToo: 'मैं भी महिला पत्रकार हूं, लेकिन ख़ुद को शिकार नहीं बनने दिया'

जिस तरह से भारत के तमाम बड़े मीडिया घरानों के न्यूज़रूम से महिलाओं के साथ हुए उत्पीड़न से जुड़ी ख़बरों का गंदा पानी बाढ़ की शक़्ल ले रहा है, मैं प्रार्थना कर रही हूं कि इस बाढ़ में वो सभी संपादक डूब मरें, जिन्होंने महिलाओं को अपनी ताक़त के नीचे दबाया और उनका उत्पीड़न किया.
जब पहली बार एक महिला पत्रकार ने एक पूर्व संपादक और मौजूदा राजनेता के ख़िलाफ़ अपना मुंह खोला तब से मेरे दिमाग़ में यह सवाल घूम रहा है कि "आख़िर किसी अख़बार के दफ़्तर में ऐसा कैसे हो सकता है?"
इस सवाल का जवाब मुझे मेरी महिला दोस्तों ने ही दिया. वो जवाब से ज़्यादा शायद मेरे लिए एक चेतावनी और सीख थी. उन्होंने कहा कि इस भोलेपन को छोड़ो और सच्चाई को समझो.
उन्होंने मुझ पर एक ऐसी छाप छोड़ी जिसका मतलब था कि इन मामलों पर मेरी हैरानी एक तरह से दिखावा है या फिर मैं आरोप लगाने वाली इन युवा महिलाओं पर विश्वास नहीं कर रही हूं. हालांकि मैं इन दोनों ही बातों से इत्तेफाक नहीं रखती.
दरअसल, मेरी इस हैरानी की अपनी कुछ वजहें हैं. मैं आख़िर इस बात पर इतनी आसानी से विश्वास क्यों नहीं कर पा रही हूं कि कोई संपादक अपने पद और ताक़त के दम पर किसी महिला का उत्पीड़न कर सकता है.
इसकी वजह यह है कि हम सभी के अपने अलग-अलग ताक़त के दम पर किसी महिला काअनुभव होते हैं. हम अपने आसपास बदले काम के वातावरण को शायद अच्छे से महसूस नहीं कर पाए.
इस बात ने मुझे यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि कैसे न्यूज़रूम के भीतर चर्चाओं के साथ सिगरेट के कश शामिल हो गए.
इसी न्यूज़रूम को हम किसी मंदिर की तरह मानते थे जहां लैंगिक समानता, खुली बहसें और आपसी मेल-मिलाप का माहौल था और जहां हर कोई अपने-अपने स्तर पर कहानियां तलाशने की कोशिश किया करते थे.
आख़िर इतना ख़ूबसूरत न्यूज़रूम किसी शिकार के मैदान में कैसे तब्दील हो गया?
इस सवाल का जवाब तलाशते हुए मैं दो अक्टूबर 1971 की यादों में खो गई. जब मैंने पहली बार एक न्यूज़रूम में क़दम रखा था. या यूं कहूं कि आदमियों की दुनिया में गई थी. ये हिंदुस्तान टाइम्स का दफ़्तर था और मैं एक ट्रेनी थी. मुझे लग रहा था कि जैसे मैने पूरा संसार जीत लिया है.
इसके बाद मेरे न्यूज़ एडिटर की वो कड़क आवाज़ मेरे लिए पहला सबक था. मुझे याद है उन्होंने कहा था, "तुम, कल से साड़ी पहन कर आओगी. मैं नहीं चाहता कि मेरे लड़कों का ध्यान तुम्हें देखकर भटके."री लड़ाई यहां से शुरू हो चुकी थी. हालांकि मुझे लगा कि यह इतना बुरा भी नहीं है, क्योंकि दुश्मन तो बहुत ही कमज़ोर है. इनके लड़के तो मेरे चूड़ीदार कुर्ते से ही घायल हो रहे हैं.
मैने बस सहमति में सिर हिलाया और अपनी सीट पर बैठ गई. उसके बाद एक दोस्ताना हाथ ने मेरी ओर चाय का कप बढ़ा दिया.
कई दिन गुज़रने के साथ ही वो सख़्त दिखने वाले न्यूज़ एडिटर मेरे सबसे अच्छे गुरु बन गए. उनके वो लड़के हमेशा मेरी मदद के लिए तैयार रहते.
जिस दिन मेरी पहली बड़ी बाइलाइन ख़बर लगी उस दिन उन्ही न्यूज़ एडिटर ने ख़ुद लेमन-टी का ऑर्डर दिया. उन दिनों में लेमन-टी दूध वाली चाय के मुक़ाबले ज़्यादा महंगी होती थी.
कुछ-कुछ यही हाल तब भी रहा जब मैं रिपोर्टिंग के लिए गई. वहां भी जो लड़ाई थी वह किसी के व्यवहार से नहीं थी. बल्की कई बार तो मुझे इस बात के लिए लड़ना पड़ जाता था कि मेरे साथी मेरी इतनी ज़्यादा चिंता क्यों करते हैं.
मुझे ख़ुद को साबित करने के लिए लड़ना पड़ता था, मुझे बताना पड़ता था कि मैं बिना किसी की मदद लिए बाहर से होने वाले कामों को भी बेहतरीन तरीक़े से कर सकती हूं.
मुझे कई बार लड़कों ने डेट पर चलने के ऑफर भी दिए, जिन्हें मैंने मना कर दिया. यह एक तरीक़ा था, यह बताने का कि मैं भी उनकी तरह रिपोर्टिंग में अच्छी हूं और जब मुझे मेरे काम की तारीफ़ें मिलतीं तो उन लड़कों को भी जवाब मिल जाता.
MeToo सामने आने के बाद जिस चीज़ ने मुझे सबसे ज़्यादा धक्का पहुंचाया वो ये है कि ये उस विश्वास का हनन है जो कि महिला पत्रकारों ने अपने वरिष्ठ अधिकारियों और पुरुष पत्रकारों के प्रति रखा था.
मुझे अपने साथ काम करने वाले पुरुष पत्रकारों पर पूरा भरोसा होता थाऔर उन्होंने भी कभी मेरे भरोसे को नहीं तोड़ा. हम साथ में यात्राएं करते, रिपोर्टिंग के दौरान तीन-तीन लोग एक कमरे में ही रहते और गंभीर बहसों में उलझ जाते थे. कभी-कभी ऐसा लगता था कि कहीं मार-पीट न हो जाए.
एक बार तो मेरी नोट बुक डस्टबिन में छिपा दी गई. इसका बदला लेते हुए मैंने ये करने वाले साथी पत्रकार की डेस्क में मरा हुआ चूहा रख दिया. हम लोग ख़ास मौक़ों पर रिपोर्टिंग के लिए झगड़ते भी थे, लेकिन कभी भी ग़लत व्यवहार और यौन इशारे करने की जगह ही नहीं थी.
उस दौर में एक मज़ाक चला करता था कि अगर मैं चप्पलें बदलकर चली जाऊं तो मेरे सुपर बॉस मुझे पहचान भी नहीं पाएं क्योंकि महिला पत्रकारों से बात करते हुए वह हमेशा नीचे देखा करते थे.

Thursday, 4 October 2018

हिंदू-मुस्लिम मुद्दा नहीं, सियासत की असल कहानी कुछ और है

जाति, माटी, भेटी यानी संस्कृति और ज़मीन के नारे पर सूबे में चुनाव जीतने वाली बीजेपी के लिए अब मुश्किल ये है कि मूल असमिया किसी भी 'बाहरी' को बर्दाश्त करने को तैयार नहीं चाहे वो हिंदू ही क्यों न हों.
ओशीम दत्ता कहते हैं कि हिंदू चाहे वो पाकिस्तान, बांग्लादेश या अफ़ग़ानिस्तान कहीं से भी आया हो उसे जगह देनी होगी, वहीं प्रदीप बरूआ का कहना है, "जो भी बाहरी है चाहे वो हिंदू ही क्यों न हो स्वीकार्य नहीं, बीजेपी को ये बात पसंद आए या न आए असमिया लोगों की यही भावना है."
इधर, गुवाहाटी में विधानसभा सत्र के पहले ही दिन पक्ष और विपक्ष दोनों ने साथ आकर एनआरसी संयोजक प्रतीक हजेला के ख़िलाफ़ पुनर्वेदन के लिए पांच दस्तावेज़ों को कम करने के मामले पर झंडा उठा लिया.
संसदीय कार्य मंत्री चंद्र मोहन पटवारी ने बयान दिया कि राज्य सरकार अगली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट के सामने ये मामला उठाएगी और साथ ही कहा कि बॉर्डर पुलिस को नए मामले फॉर्नर्स ट्राइब्यूनल में भेजने से रोक दिया गया है.
कांग्रेस राज्य सरकार से नागरकिता संशोधन बिल पर रुख़ साफ़ करने को कह रही है क्योंकि उसके अनुसार ये 1985 के असम समझौते की मूल भावना के ख़िलाफ़ है जिसमें उन्हीं लोगों को नागरिकता देने की बात है जो 24 मार्च 1971 तक या उससे पहले असम आ चुके थे.
कौस्तुभ डेका कहते हैं, "एनआरसी एक तरह की दुविधा बनकर उभरा है जिसमें कोई विजयी नज़र नहीं आ रहा," और एक सोच ये उभरती दिख रही कि क्या एनआरसी उस लक्ष्य को हासिल कर पाया जिसके लिए ये तैयार हुआ था.
दूसरी और हिंदुत्व से जुड़े संगठन समुदाय के भीतर जाकर सबके नाम शामिल करवाए जाने का भरोसा दिला रहे हैं.
डेका के मुताबिक़ धर्म के आधार पर विभाजन की रणनीति की सीमित सफ़लता के बाद बीजेपी में मूल असमियों को विशेष अधिकार देने का विचार प्रबल हो रहा है.
पार्टी पहले भी बोडो, दीमा और दूसरे समुदायों से नज़दीकियां बढ़ाती रही है.
हालांकि असम में जहां सदियों से दूसरी जगहों से लोगों का आगमन जारी रहा है वहां मूल निवासी किस आधार पर चिन्हित किए जाएंगे ये भी कुछ नए सवाल खड़े कर सकता है.
अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने कहा है कि सऊदी अरब के किंग सलमान, अमरीकी सेना के सहयोग के बिना, दो हफ़्ते तक भी राज नहीं कर पाएंगे.
अमरीकी राज्य मिसिसिपी में एक रैली को संबोधित करते हुए ट्रंप ने कहा, "हम सऊदी अरब की सुरक्षा करते हैं. वो काफ़ी अमीर हैं. मैं किंग सलमान को पसंद करता हूँ. लेकिन मैंने उन्हें बता दिया है - हम आपकी हिफ़ाज़त कर रहे हैं. अगर हम आपके पीछे नहीं रहे तो आप दो हफ़्ते बाद राज नहीं कर पाएंगे."
राष्ट्रपति ट्रंप ने ये नहीं बताया कि उन्होंने सऊदी अरब के किंग सलमान के साथ बातचीत कब की. सऊदी अरब खाड़ी के मुल्क़ों में अमरीका का शायद सबसे भरोसेमंद साथी है.
कुवैत के मुद्दे पर हुए पहले इराक़ युद्ध से लेकर अब तक, दोनों देश एक-दूसरे के साथ रहे हैं. ऐसे में ये सवाल उठता है कि ट्रंप ने अपने सहयोगी देश के लिए इतने कड़े शब्दों का प्रयोग क्यों किया?
राष्ट्रपति बनने के बाद सऊदी अरब उन कुछ पहले देशों में शामिल था जहां ट्रंप पहुंचे थे. सऊदी अरब में तलवारों के डांस वाला उनका वीडियो भी वायरल हुआ था. साल-डेढ़ साल में इस रिश्ते की गर्माहट ग़ायब क्यों हो रही है?
इसकी आसान विवेचना ये हो सकती है कि ट्रंप अक्सर बिना अधिक सोचे-समझे सार्वजनिक बयान दे देते हैं.
शायद राष्ट्रपति ट्रंप अपने सहयोगियों पर तेल के बढ़ते दामों पर लगाम कसने के लिए ऐसे बयान दे रहे हैं, लेकिन तेल की इस राजनीति की कई परतें हैं.
इससे पहले भी अमरीका तेल के मुद्दे पर सऊदी अरब को चेतावनी देता रहा है. इसी साल जून में राष्ट्रपति ट्रंप ने एक ट्वीट के ज़रिए सऊदी अरब के किंग सलमान से तेल के दाम कम करने के लिए कहा था. उन्होंने ये भी कहा था कि सऊदी अरब इसके लिए राज़ी हो गया है.
तब ट्रंप ने तेल के बढ़ते दामों के लिए ईरान और वेनेज़ुएला को ज़िम्मेदार ठहराया था.
लेकिन हाल ही में अमरीका ने ईरान पर और प्रतिबंध लगाने की घोषणा की है. हालांकि ये प्रतिबंध नवंबर से लागू होंगे, लेकिन इनकी घोषणा भर से तेल का बाज़ार गर्मा गया. ईरान दुनिया में कच्चे तेल का अहम निर्यातक है और वो हर दिन क़रीब तीस लाख बैरल तेल निर्यात करता है.
तेल के दामों पर नज़र रखने वाले स्टीफ़न इन्नेस ने रॉयटर्स को बताया, " ऐसी चिंता है कि नंवबर में जैसे ही ईरान के तेल पर पाबंदी शुरू होगी तेल के बाज़ार पर दबाव बहुत अधिक बढ़ जाएगा. इस समय में बाज़ार शायद प्रतिबंधों के असर को कम ही भांप रहा है. आगे हालात और बिगड़ सकते हैं."
ईरान पर प्रतिबंधों से तेल के दाम बढ़ते हैं तो इसका नुकसान अमरीका को होता है. इन दामों को काबू में रखने के लिए ही अमरीका सऊदी अरब पर दवाब बनाता रहा है और ट्रंप का ताज़ा बयान भी इसी ओर संकेत करता है.
मुसलमानों के पवित्र स्थलों मक्काऔर मदीना के सऊदी अरब में होने के कारण दुनिया के करोड़ों मुसलमाने इसे ख़ासी अहमियत देते हैं, लेकिन शिया बहुल ईरान इस्लामी दुनिया की अगुवाई के लिहाज़ से ख़ुद को सऊदी अरब का प्रतिद्वंदी मानता है.
अमरीका और ईरान की अदावत जगज़ाहिर है. ऐसे में सऊदी अरब और अमरीका एक तरह से गल्फ़ में नेचुरल एलाई (स्वाभाविक सहयोगी) हैं.
इराक़ की सियासी उथल-पुथल, मध्य-पूर्व में इस्लामी चरमपंथ और ईरान का कथित परमाणु कार्यक्रम सऊदी अरब और अमरीका के बीच रिश्तों को और नज़दीकी बनाता है. ऐसे में ट्रंप की सख़्तबयानी के बावजूद इन दोनों देशों के बीच रिश्तों में यथास्थिति बनी रहेगी क्योंकि फ़िलहाल कम से कम ईरान और इस्लामी चरमपंथ की वजह से दोनों देशों को एक-दूसरे की सख़्त ज़रूरत है.
ट्रंप ने राष्ट्रपति बनने के बाद कई बार सऊदी अरब और उसके सत्ताधारी परिवार के लिए कड़े शब्दों का प्रयोग किया है. खाड़ी की मीडिया में इसके प्रति एक किस्म का रोष भी है.
मिडिल ईस्ट आई में मदावी अल-रशीद लिखती हैं, "ट्रंप के अमरीका और सऊदी अरब के बीच रिश्तों में कूटनीति का पर्दा भी ग़ायब है. इसमें विनम्र भाषा तक ग़ायब है. "
उन्हें लगता है कि यमन में सऊदी अरब के हस्तक्षेप का साथ देने के बदले अमरीका तेल के दामों पर अपनी मनमर्ज़ी करना चाहता है.
शायद ये यमन की जंग ही है जिसने सऊदी अरब की अमरीका पर निर्भरता कई गुना बढ़ा दी है. शायद यमन के गृहयुद्ध में दख़ल भी सऊदी अरब ने खाड़ी के देशों में अपना रौब बनाए रखने के लिए ही दिया था.
लेकिन इस लड़ाई को जारी रखने में सऊदी अरब को हर हाल में अमरीका का सहयोग चाहिए.

Monday, 1 October 2018

नज़रिया: 'उन्नाव, अलीगढ़ और लखनऊ' यूपी पुलिस के लिए दाग़

उन्होंने तो ये तक कहा था कि भले ही ब्रिटिश शासन में पुलिस भारतीय लोगों के प्रति असंवेदनशीलता रही हो, लेकिन उस दौर में फ़र्ज़ी जाँच या एनकाउंटर नहीं होते थे.
विवेक तिवारी का मामला कोई पहला मामला नहीं है, जब पुलिस ने किसी शख़्स को कार नहीं रोकने पर गोली मार दी हो. लेकिन जो बदलाव अब महसूस किया जा सकता है वो ये है कि हत्या का अभियुक्त पुलिसवाला एक घमंडी आदमी की शैली में ख़ुलेआम बयानबाज़ी भी कर रहा है.
वो कैमरे पर बिना किसी डर के अपने बयान बदल रहा है और उसके साथी थाने में मुस्कुरा रहे हैं.
पुलिसवाले का आरोप है कि विवेक तिवारी उनकी मोटरसाइकल पर कार चढ़ाकर, उन्हें मारना ही चाहते थे. लेकिन ज़्यादा चौंकाने वाली बात ये थी कि शुरुआत में उनके वरिष्ठ पुलिस अधिकारी उनके दावों को सही भी मान रहे थे.
यदि मीडिया ने लगातार दबाव न बनाया होता तो लखनऊ के पुलिस अधीक्षक भी अपने सिपाही की बात ख़ुशी-ख़ुशी दोहरा रहे होते. केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह के व्यक्तिगत हस्तक्षेप के बाद ही गोली चलाने वाले सिपाही प्रशांत चौधरी के ख़िलाफ़ धारा 302 के तहत क़त्ल का मामला दर्ज किया गया.
राजनाथ सिंह ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और पुलिस महानिदेशक ओपी सिंह से बात की. लखनऊ राजनाथ सिंह का संसदीय क्षेत्र भी है, वो मूकदर्शक कैसे बने रह सकते थे?
और फिर मुख्यमंत्री और पुलिस महानिदेशक ने घटना की आलोचना की और दोषियों पर सख़्त कार्रवाई सुनिश्चित करने का बयान दिया. पीड़ित परिवार का गुस्सा शांत करने के लिए सरकार ने 25 लाख रुपए की सहायता राशि की घोषणा भी कर दी और मृतक की पत्नी को लखनऊ नगर निगम में क्लर्क की नौकरी भी दे दी.
हालांकि, सभी ये सवाल ज़रूर पूछ रहे हैं कि क्या मुख्यमंत्री एनकाउंटर को लेकर अपनी नीति पर पुनर्विचार करेंगे. स्पष्ट तौर पर इसी नीत ने 'गोली चलाने को उत्सुक' पुलिसवालों का मनोबल बढ़ाया है. उत्तर प्रदेश के पुलिसवालों को अब आम तौर पर ये लगता है कि वो क़त्ल करके भी आसानी से बच जाएंगे.
बीते 12 महीनों में योगी की पुलिस ने प्रदेशभर में 1600 से अधिक एनकाउंटर किए हैं. इनमें 67 लोग मारे गए हैं जिनमें से अधिकतर ऐसे छोटे-मोटे अपराधी थे जिन पर पुलिस ने ईनाम घोषित करके उन्हें बड़ा बना दिया था.
एनकाउंटर में मारे गए कथित अपराधियों में से ज़्यादातर मुसलमान, दलित और अन्य पिछड़ा वर्गों से हैं. मुठभेड़ों के ये आंकड़े योगी सरकार के किसी वर्ग से भेदभाव न करने और सबका साथ सबका विकास के दावों की पोल खोलते हैं.
अलीगढ़ में जिस तरह कथित एनकाउंटर की लाइव कवरेज़ के लिए मीडिया कर्मियों को बुलाया गया वो उन्हीं पूर्वाग्रहों को मज़बूत करता है जिनसे यूपी पुलिस अपराध नियंत्रण कर रही है.
बीजेपी के कई नेता भी ये बात मानते हैं कि एनकाउंटर अभियान सरकार की अपराध के ख़िलाफ़ सख़्त छवि स्थापित करने के लिए ही चलाया जा रहा है. सरकार ये संदेश देना चाहती है कि वो क़ानून व्यवस्था को लेकर गंभीर है.
वो क़ानून व्यवस्था जो कथित तौर पर पूर्ववर्ती समाजवादी सरकार के कार्यकाल में बेहद चरमरायी हुई थी. लेकिन तथ्य ये हैं कि जघन्य अपराध पहले की तरह ही हो रहे हैं और बलात्कार के आंकड़ें बढ़ रहे हैं. बिडम्बना ये है कि इस सबके बावजूद मुख्यमंत्री की प्राथमिकता कथित 'लव जिहाद' रोकना, एंटी रोमियो स्कवायड बनाना और 'गो हत्या' रोकना ही है.
उन्नाव को वो चर्चित मामला तो हम सबको याद ही है जिसमें एक कथित गैंगरेप पीड़िता के पिता को थाने के अंदर ही बेरहमी से पीट-पीटर मार दिया गया. पुलिस ने आंखें मूंद लीं क्योंकि ये सब एक भाजपा विधायक के कहने पर हो रहा था. घटना के मीडिया में आने और हाई कोर्ट के स्वतः संज्ञान लेने के बाद ही प्रदेश सरकार ने कार्रवाई की और विधायक को गिरफ़्तार कर लिया गया.
प्रकाश सिंह पुलिस सुधार समिति की सिफ़ारिशों और सुप्रीम कोर्ट की ओर से निर्धारित दिशा-निर्देशें का पालन करके ही सरकार 'पुलिस व्यवस्था के बिगड़ रहे स्वास्थ्य' को ठीक कर सकती है.
इनमें से एक अहम सिफ़ारिश है पुलिस की क़ानून व्यवस्था बनाए रखने की भूमिका को जांच करने की भूमिका से अलग करना. प्रकाश सिंह पंजाब और यूपी पुलिस के प्रमुख रहने के अलावा बीएसएफ़ के महानिदेशक भी रह चुके हैं. उन्होंने एक स्वतंत्र जांच एजेंसी की स्थापना की स्पष्ट सिफ़ारिश की थी.
पांच साल पहले भारत के सुप्रीम कोर्ट ने भी इन सिफ़ारिशों पर अपनी मुहर लगा दी थी. लेकिन राज्य सरकारें इन्हें नज़रअंदाज़ करती रहीं. और अब नतीजा बिलकुल साफ़ है. प्पल के कर्मचारी विवेक तिवारी की मौत के मामले की जांच हत्या के अभियुक्तों के सहकर्मी ही करेंगे. वो पुलिस कर्मी जो क़ानून व्यवस्था लागू करने के अलावा आपराधिक मामलों की जांच करने की भूमिका भी निभाते हैं. और इस बात से कौन इनकार कर सकता है कि ख़ून पानी से गाढ़ा होता है.
ऐसे में अगर पुलिस के जांचकर्ता अपने सहकर्मियों को बचाने के लिए मामले को हल्का करने की कोशिशें करें तो किसी को हैरानी नहीं होनी चाहिए. यही वजह है कि ऐसे मामले अक्सर सीबीआई के पास पहुंच जाते हैं. सीबीआई को आज भी स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच एजेंसी तो माना ही जाता है, भले ही ऐसा नहीं हो.