ओशीम दत्ता कहते हैं कि हिंदू चाहे वो पाकिस्तान, बांग्लादेश या अफ़ग़ानिस्तान कहीं से भी आया हो उसे जगह देनी होगी, वहीं प्रदीप बरूआ का कहना है, "जो भी बाहरी है चाहे वो हिंदू ही क्यों न हो स्वीकार्य नहीं, बीजेपी को ये बात पसंद आए या न आए असमिया लोगों की यही भावना है."
इधर, गुवाहाटी में विधानसभा सत्र के पहले ही दिन पक्ष और विपक्ष दोनों ने साथ आकर एनआरसी संयोजक प्रतीक हजेला के ख़िलाफ़ पुनर्वेदन के लिए पांच दस्तावेज़ों को कम करने के मामले पर झंडा उठा लिया.
संसदीय कार्य मंत्री चंद्र मोहन पटवारी ने बयान दिया कि राज्य सरकार अगली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट के सामने ये मामला उठाएगी और साथ ही कहा कि बॉर्डर पुलिस को नए मामले फॉर्नर्स ट्राइब्यूनल में भेजने से रोक दिया गया है.
कांग्रेस राज्य सरकार से नागरकिता संशोधन बिल पर रुख़ साफ़ करने को कह रही है क्योंकि उसके अनुसार ये 1985 के असम समझौते की मूल भावना के ख़िलाफ़ है जिसमें उन्हीं लोगों को नागरिकता देने की बात है जो 24 मार्च 1971 तक या उससे पहले असम आ चुके थे.
कौस्तुभ डेका कहते हैं, "एनआरसी एक तरह की दुविधा बनकर उभरा है जिसमें कोई विजयी नज़र नहीं आ रहा," और एक सोच ये उभरती दिख रही कि क्या एनआरसी उस लक्ष्य को हासिल कर पाया जिसके लिए ये तैयार हुआ था.
दूसरी और हिंदुत्व से जुड़े संगठन समुदाय के भीतर जाकर सबके नाम शामिल करवाए जाने का भरोसा दिला रहे हैं.
डेका के मुताबिक़ धर्म के आधार पर विभाजन की रणनीति की सीमित सफ़लता के बाद बीजेपी में मूल असमियों को विशेष अधिकार देने का विचार प्रबल हो रहा है.
पार्टी पहले भी बोडो, दीमा और दूसरे समुदायों से नज़दीकियां बढ़ाती रही है.
हालांकि असम में जहां सदियों से दूसरी जगहों से लोगों का आगमन जारी रहा है वहां मूल निवासी किस आधार पर चिन्हित किए जाएंगे ये भी कुछ नए सवाल खड़े कर सकता है.
अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने
कहा है कि सऊदी अरब के किंग सलमान, अमरीकी सेना के सहयोग के बिना, दो
हफ़्ते तक भी राज नहीं कर पाएंगे.
अमरीकी राज्य मिसिसिपी में एक
रैली को संबोधित करते हुए ट्रंप ने कहा, "हम सऊदी अरब की सुरक्षा करते हैं.
वो काफ़ी अमीर हैं. मैं किंग सलमान को पसंद करता हूँ. लेकिन मैंने उन्हें
बता दिया है - हम आपकी हिफ़ाज़त कर रहे हैं. अगर हम आपके पीछे नहीं रहे तो
आप दो हफ़्ते बाद राज नहीं कर पाएंगे."राष्ट्रपति ट्रंप ने ये नहीं बताया कि उन्होंने सऊदी अरब के किंग सलमान के साथ बातचीत कब की. सऊदी अरब खाड़ी के मुल्क़ों में अमरीका का शायद सबसे भरोसेमंद साथी है.
कुवैत के मुद्दे पर हुए पहले इराक़ युद्ध से लेकर अब तक, दोनों देश एक-दूसरे के साथ रहे हैं. ऐसे में ये सवाल उठता है कि ट्रंप ने अपने सहयोगी देश के लिए इतने कड़े शब्दों का प्रयोग क्यों किया?
राष्ट्रपति बनने के बाद सऊदी अरब उन कुछ पहले देशों में शामिल था जहां ट्रंप पहुंचे थे. सऊदी अरब में तलवारों के डांस वाला उनका वीडियो भी वायरल हुआ था. साल-डेढ़ साल में इस रिश्ते की गर्माहट ग़ायब क्यों हो रही है?
इसकी आसान विवेचना ये हो सकती है कि ट्रंप अक्सर बिना अधिक सोचे-समझे सार्वजनिक बयान दे देते हैं.
शायद राष्ट्रपति ट्रंप अपने सहयोगियों पर तेल के बढ़ते दामों पर लगाम कसने के लिए ऐसे बयान दे रहे हैं, लेकिन तेल की इस राजनीति की कई परतें हैं.
इससे पहले भी अमरीका तेल के मुद्दे पर सऊदी अरब को चेतावनी देता रहा है. इसी साल जून में राष्ट्रपति ट्रंप ने एक ट्वीट के ज़रिए सऊदी अरब के किंग सलमान से तेल के दाम कम करने के लिए कहा था. उन्होंने ये भी कहा था कि सऊदी अरब इसके लिए राज़ी हो गया है.
तब ट्रंप ने तेल के बढ़ते दामों के लिए ईरान और वेनेज़ुएला को ज़िम्मेदार ठहराया था.
लेकिन हाल ही में अमरीका ने ईरान पर और प्रतिबंध लगाने की घोषणा की है. हालांकि ये प्रतिबंध नवंबर से लागू होंगे, लेकिन इनकी घोषणा भर से तेल का बाज़ार गर्मा गया. ईरान दुनिया में कच्चे तेल का अहम निर्यातक है और वो हर दिन क़रीब तीस लाख बैरल तेल निर्यात करता है.
तेल के दामों पर नज़र रखने वाले स्टीफ़न इन्नेस ने रॉयटर्स को बताया, " ऐसी चिंता है कि नंवबर में जैसे ही ईरान के तेल पर पाबंदी शुरू होगी तेल के बाज़ार पर दबाव बहुत अधिक बढ़ जाएगा. इस समय में बाज़ार शायद प्रतिबंधों के असर को कम ही भांप रहा है. आगे हालात और बिगड़ सकते हैं."
ईरान पर प्रतिबंधों से तेल के दाम बढ़ते हैं तो इसका नुकसान अमरीका को होता है. इन दामों को काबू में रखने के लिए ही अमरीका सऊदी अरब पर दवाब बनाता रहा है और ट्रंप का ताज़ा बयान भी इसी ओर संकेत करता है.
मुसलमानों के पवित्र स्थलों मक्काऔर मदीना के सऊदी अरब में होने के कारण दुनिया के करोड़ों मुसलमाने इसे ख़ासी अहमियत देते हैं, लेकिन शिया बहुल ईरान इस्लामी दुनिया की अगुवाई के लिहाज़ से ख़ुद को सऊदी अरब का प्रतिद्वंदी मानता है.
अमरीका और ईरान की अदावत जगज़ाहिर है. ऐसे में सऊदी अरब और अमरीका एक तरह से गल्फ़ में नेचुरल एलाई (स्वाभाविक सहयोगी) हैं.
इराक़ की सियासी उथल-पुथल, मध्य-पूर्व में इस्लामी चरमपंथ और ईरान का कथित परमाणु कार्यक्रम सऊदी अरब और अमरीका के बीच रिश्तों को और नज़दीकी बनाता है. ऐसे में ट्रंप की सख़्तबयानी के बावजूद इन दोनों देशों के बीच रिश्तों में यथास्थिति बनी रहेगी क्योंकि फ़िलहाल कम से कम ईरान और इस्लामी चरमपंथ की वजह से दोनों देशों को एक-दूसरे की सख़्त ज़रूरत है.
ट्रंप ने राष्ट्रपति बनने के बाद कई बार सऊदी अरब और उसके सत्ताधारी परिवार के लिए कड़े शब्दों का प्रयोग किया है. खाड़ी की मीडिया में इसके प्रति एक किस्म का रोष भी है.
मिडिल ईस्ट आई में मदावी अल-रशीद लिखती हैं, "ट्रंप के अमरीका और सऊदी अरब के बीच रिश्तों में कूटनीति का पर्दा भी ग़ायब है. इसमें विनम्र भाषा तक ग़ायब है. "
उन्हें लगता है कि यमन में सऊदी अरब के हस्तक्षेप का साथ देने के बदले अमरीका तेल के दामों पर अपनी मनमर्ज़ी करना चाहता है.
शायद ये यमन की जंग ही है जिसने सऊदी अरब की अमरीका पर निर्भरता कई गुना बढ़ा दी है. शायद यमन के गृहयुद्ध में दख़ल भी सऊदी अरब ने खाड़ी के देशों में अपना रौब बनाए रखने के लिए ही दिया था.
लेकिन इस लड़ाई को जारी रखने में सऊदी अरब को हर हाल में अमरीका का सहयोग चाहिए.
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